शब्दों की शक्ति और मन का द्वंद्व: क्या शब्दाडंबर ही है भावनाओं की असली अभिव्यक्ति?
यह लेख शब्दों की गहराई, उनके प्रभाव और मानवीय संवेदनाओं के बीच के जटिल संबंधों का विश्लेषण करता है। इसमें बताया गया है कि शब्दों का सही चयन और समर्पण ही आत्मा तक पहुँचने का मार्ग है, जबकि व्यर्थ का शब्दाडंबर मन में द्वंद्व और अशांति पैदा करता है। लेखक के अनुसार, वाणी का मूल्य समझकर उसका संयमित उपयोग करना ही व्यक्ति के मानसिक और सामाजिक कल्याण का आधार है।
शब्दाडंबर .......
शब्दों की टंकार बता देती है कि शब्द किस रूप,रंग और साज- सजा में सजाए गए हैं।शब्दों की आपधापी में वक्त बेवक्त मोड़ से गुजरा हर एक वाक्य शायद तुम्हें भी याद हो, कुछ कहने और ना कह सकने की विद्रूपता मेरे मन में थी।अहं लेश मात्र नहीं पर हर जगह अंधियारो सा सिंचित मन था जिसे पग-पग पर इम्तिहान देना पड़ रहा था।अपनों का अपनों से विश्वास समाप्त ही समझो, शब्दों में कठोरता और कठोर लगने वाले शब्द आसपास ही नजर आ रहे थे।शब्दों के हर कंकर पर सौम्यता का रुख था जिसे केवल महसूस करना भर था। एक व्यक्ति के संचित मन को छूने के लिए उसकी आत्मा को छूना आवश्यक है।केवल शरीर और मन को छूकर वापस आ जाना और रूह तक ना पहुंच पाना प्रेम नहीं है।प्रेम की अनंत्तर पराकाष्ठा हर एक असंभव सत्य को सत्य की ओर ले जाने वाला सुगम मार्ग है। जिसे व्यक्ति अपने केवल उन्हीं दृष्टिकोण से छू सकता है जिनमें हर एक कार्य को करने के प्रति समर्पण है।अद्वितीय सत्ता का महत्वाकांक्षी अपनी ही कृति पर अहं दिखाने वाला शायद कभी नहीं ....
विधाता विधेय से बढ़कर नहीं होता और विधेय कभी अपनी ही घुरी नहीं लांघता ।वह लाघंता है तो केवल उस बीज को जिसे उसने वीजारोपण के माध्यम से अपनी विशेष छवि का निर्विकार किया है लफ्जों और लहजों की अहमियत का पता हर उस विशेष में शेष रह जाता है जिसे सदा ही अस्वीकारा गया है। मन की शांति और मनोवैज्ञानिक विकारों से वह खुद को कभी दूर नहीं कर सकता। सांवेगिक पलायन उसका शब्दशः मात्र है।अति कष्ट दायक विकृति उसकी अपनी ही बनाई हुई बेशकीमती कृति है जिसका संपादक वह स्वयं है। वह रुका ठहरा और निरंतर गतिशील होने के लिए स्वयं को उन बेड़ियों में जकड़ लिया जिसका खुलना तय था।अनाधिकृत मामलों में उसकी यही बेशकीमती चौसरे उसके शरीर,मन और आत्मा के त्याग का कारण बनती है ।
लुकी छिपी संश्लिष्टता उसे घेर कर उसका स्वयं में स्वयं का मर्दन करती है और अपने निरीह आकार को नया जन्म देते हुए समय और समाज का मार्ग प्रशस्त करती हैं ।
असंख्य शब्द,संख्या में ही गिने जाते हैं पर उनका मूल्य एकरूपता या समरूपता लिए हुए नहीं होता है विपरीत द्वियार्थक शब्द उन्हें और भी पेशेवर बना देते हैं..
बातों की लहजो में कभी-कभी अधिकांश शब्द अपना ही मूल्य को देते हैं अतः मुख से निकले शब्दों का मूल्य केवल वाणी ही जानती है।कब,कहां,कितना, किसे किस पर खर्च करना है।यह आपका अपना सूक्ष्म विचार है
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Comments (1)
Apka vishleshan ati uttam laga. Shabdo ka chayan eyam vyakhya sarvottam hai
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