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धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा: क्या यह सिर्फ प्रशासनिक जवाबदेही है या देश को अस्थिर करने का बड़ा राजनीतिक चक्रव्यूह?

Published on 25 July 2026, 10:01 AM 217 Views
धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा: क्या यह सिर्फ प्रशासनिक जवाबदेही है या देश को अस्थिर करने का बड़ा राजनीतिक चक्रव्यूह?
Image generated by AI for illustrative purposes

परीक्षा तंत्र में नाकामी, सड़कों पर उतरते युवा और विदेशी फंडिंग पर कसता शिकंजा! शिक्षा मंत्री के इस्तीफे से उठे देश के तीन सबसे बड़े सवाल। क्या यह व्यवस्था में सुधार की शुरुआत है या कोई प्रायोजित नैरेटिव?

एक संपादक के दृष्टिकोण से देखें तो देश की प्रतियोगी परीक्षा प्रणाली, राजनीतिक बहस और नागरिक समाज से जुड़े हालिया घटनाक्रम किसी एक पक्षीय दृष्टिकोण तक सीमित नहीं हैं। इन्हें निष्पक्षता से समझने के लिए तीन प्रमुख स्तंभों—प्रशासनिक जवाबदेही, राजनीतिक रणनीति और कानूनी अनुपालन—पर ध्यान केंद्रित करना आवश्यक है।

​​1. प्रशासनिक सुधार और संस्थागत जवाबदेही

​देश में राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) द्वारा आयोजित की जाने वाली परीक्षाओं में पारदर्शिता और विश्वसनीयता बनाए रखना एक मुख्य चुनौती रही है। जुलाई 2021 से शिक्षा मंत्रालय का कार्यभार संभाल रहे धर्मेंद्र प्रधान के कार्यकाल के दौरान, NEET-UG और UGC-NET परीक्षाओं में गड़बड़ी के मामलों के बाद जून 2024 में पूर्व इसरो प्रमुख डॉ. के. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समिति का गठन किया गया।

​इस समिति की सिफारिशों के आधार पर कंप्यूटर-आधारित परीक्षा (CBT) मॉडल अपनाने, डेटा सुरक्षा मजबूत करने और NTA के पुनर्गठन की प्रक्रिया शुरू की गई। इसके साथ ही संसद द्वारा 'सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2024' लागू किया गया।

​हालांकि, मई 2026 में NEET-UG परीक्षा रद्द होने, 21 जून 2026 को 5,400 केंद्रों पर पुनः परीक्षा आयोजित करने की घोषणा और कॉकरोच जनता पार्टी जैसे युवा समूहों के विरोध प्रदर्शनों के बीच, जुलाई 2026 में धर्मेंद्र प्रधान ने छात्रों के हितों को सर्वोपरि बताते हुए और नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए केंद्रीय मंत्रिमंडल से अपना इस्तीफा दे दिया। यह कदम प्रशासनिक व्यवस्था में शीर्ष स्तर पर जवाबदेही तय करने के प्रयास को दर्शाता है।

​2. राजनीतिक नैरेटिव और वैश्विक मंचों पर बहस

​इन संस्थागत चुनौतियों को राजनीतिक रणनीतियों से भी जोड़कर देखा गया। मार्च 2023 में कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में दिए गए भाषण में भारतीय लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्थिति और निगरानी का मुद्दा उठाया गया।

​सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए आरोप लगाया कि विदेशी मंचों का उपयोग देश की छवि को प्रभावित करने के लिए किया जा रहा है। इसके अलावा, सत्तारूढ़ दल ने विपक्ष के नेताओं के विदेश दौरों के वित्तपोषण और पारदर्शिता पर सवाल उठाए। वहीं, विपक्ष का तर्क रहा कि वे लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा और जनसामान्य की चिंताओं को सामने लाने का कार्य कर रहे हैं।

​3. नागरिक समाज, विरोध प्रदर्शन और कानूनी अनुपालन

​शिक्षा प्रणाली और नीतिगत मुद्दों पर सामाजिक संगठनों की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है। सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक द्वारा 26 दिनों की भूख हड़ताल और जंतर-मंतर पर प्रदर्शनों के माध्यम से शैक्षणिक व क्षेत्रीय चिंताओं को प्रमुखता से उठाया गया।

​दूसरी ओर, राज्य सुरक्षा और वित्तीय नियमों के अनुपालन के तहत गृह मंत्रालय ने सीबीआई जांच की रिपोर्ट के आधार पर जुलाई 2026 में सोनम वांगचुक से जुड़े एनजीओ SECMOL का FCRA पंजीकरण रद्द कर दिया। इसमें विदेशी अनुदान खातों में घरेलू धन जमा करने जैसे नियमों के उल्लंघन का उल्लेख किया गया। जहां प्रशासनिक दृष्टिकोण इसे वित्तीय पारदर्शिता और कानून का प्रवर्तन मानता है, वहीं नागरिक समाज का एक वर्ग इसे विरोध प्रदर्शनों की पृष्ठभूमि में की गई कार्रवाई के रूप में देखता है।

​संपादकीय निष्कर्ष और पाठकों से सवाल

​संक्षेप में, यह पूरा घटनाक्रम एक तरफ केंद्रीय परीक्षा प्रणाली के तकनीकी व प्रशासनिक पुनर्गठन की आवश्यकता को दर्शाता है, तो दूसरी तरफ राजनीतिक दांव-पेंच और नियमन के दायरे में आने वाले नागरिक समाज के संघर्ष को उजागर करता है।

​आपकी क्या राय है?

एक जागरूक नागरिक और पाठक होने के नाते, आप इन घटनाक्रमों को किस रूप में देखते हैं? क्या धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा और परीक्षाएं सुधारने के प्रयास संस्थागत जवाबदेही का प्रतीक हैं, या आपको लगता है कि युवा असंतोष और विरोध प्रदर्शनों के पीछे राजनीतिक उद्देश्य अधिक प्रभावी रहे हैं? नीचे अपनी राय जरूर साझा करें।

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